Friday, January 16, 2009

चुनावों से आस,मिलता नहीं कुछ खास......

राजनीतिक उठा -पटक के बीच एक तबका वो भी है जो सड़कों पर अपना जीवन गुजार रहा है । इस तबके के पास न तो खाने के लिए पौष्टिक आहार है और न ही पहनने के लिए अच्छे कपड़े । जनवरी की कड़कडाती सर्दी के बावजूद इस तबके के पास ओढ़ने के लिए कम्बल का भी अभाव है । ये इन लोगों का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि चुनावों के समय इन लोगो से सभी नेता मिलते हैं बड़े -बड़े वादें करते हैं लेकिन चुनावों के बाद इन वादों को भूलने में इन्हे ज़रा भी वक्त नही लगता है । चुनावों का दौर इस तबके के लिए एक महोत्सव सा बन गया है जिसमे कुछ समय के लिए इनके पास खुशियाँ ज़रूर आती हैं लेकिन उसके बाद एक लंबा समय आशा की किरण के इंतजार में गुज़रता है । नेता तो एक बार जीतने के बाद लंबे समय बाद ही दुबारा वापस आते हैं । इस बीच ये नेता संसद में हंगामा करते हैं । संसद की गरिमा को नष्ट करते हैं। लेकिन जनता के द्वारा चुने गए ये नेता जनता की समस्याओं को भूल जाते हैं , इन्हे याद रहता है तो केवल अपनी कुर्सी को बचाने का हथकंडा और कुछ नहीं ।
दोस्ती नाम नहीं जताने का
ये एहसास है सदा साथ निभाने का ,
गम के मौके पर खुशी से मिलाने का
कदम से कदम मिलकर साथ चलते जाने का /